(प्रारंभिक परीक्षा: समसामयिक घटनाक्रम) (मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन) |
संदर्भ
वन ग्रह की जीवन रेखाएँ हैं जो लाखों लोगों को ऑक्सीजन, भोजन, दवा और आजीविका प्रदान करते हैं। हर साल 21 मार्च को सभी प्रकार के वनों का उत्सव मनाने, वृक्षों एवं वनों के महत्व को पहचानने और उनकी रक्षा के लिए कार्रवाई करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस मनाया जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस के बारे में
- परिचय : वर्ष 2012 में संयुक्त राष्ट्र ने वनों की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में जागरूकता बढ़ाने और उत्सव मनाने के लिए 21 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस (IDF) घोषित किया।
- इसे पहली बार वर्ष 2013 में आयोजित किया गया।
- वर्ष 2025 की थीम : वन एवं भोजन (Forests and Food)
- यह थीम वनों एवं वैश्विक खाद्य सुरक्षा के बीच गहरे संबंध पर जोर देती है।
- उद्देश्य : वनों के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना एवं वन संरक्षण के लिए वैश्विक प्रयासों को प्रोत्साहित करना
- आयोजक : संयुक्त राष्ट्र और खाद्य एवं कृषि संगठन के समन्वय द्वारा
भारत में वन संरक्षण, खाद्य सुरक्षा एवं आजीविका
भारत में वन संस्कृति, अर्थव्यवस्था एवं जैव-विविधता से गहराई से जुड़े हुए हैं और उनकी सुरक्षा केवल एक पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं है बल्कि एक मौलिक जिम्मेदारी भी है। इस दिशा में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और भारत सरकार के संबंधित मंत्रालयों ने विभिन्न योजनाएँ शुरू की हैं जो वनों को खाद्य सुरक्षा, पोषण तथा आजीविका से जोड़ती हैं।

राष्ट्रीय कृषि वानिकी नीति
कृषि वानिकी एक टिकाऊ भूमि-उपयोग प्रणाली है जो कृषि उत्पादकता बढ़ाने, मृदा उर्वरता में सुधार करने और किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत प्रदान करने के लिए वृक्षों व फसलों का एकीकरण करती है। इसकी क्षमता को पहचानते हुए भारत सरकार ने खेतों में वृक्षारोपण को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2014 में राष्ट्रीय कृषि वानिकी नीति शुरू की।
योजना के उद्देश्य
राष्ट्रीय कृषि वानिकी योजना का उद्देश्य जलवायु अनुकूलन, पर्यावरण संरक्षण एवं आर्थिक लाभ के लिए किसानों को कृषि वानिकी अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है।
कार्यान्वन रणनीति
यह योजना नर्सरी एवं ऊतक संवर्धन इकाइयों के माध्यम से गुणवत्ता रोपण सामग्री के उत्पादन व वितरण पर जोर देती है। आई.सी.ए.आर.-केंद्रीय कृषि वानिकी अनुसंधान संस्थान तकनीकी सहायता, प्रमाणन एवं प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए नोडल एजेंसी है।
बाजार आर्थिक सहयोग
कृषि वानिकी को लाभदायक बनाने के लिए यह योजना खेत में उगाए गए वृक्षों के लिए मूल्य गारंटी और बाय-बैक विकल्पों के माध्यम से किसानों का समर्थन करती है। यह कृषि वानिकी उत्पादों के विपणन एवं प्रसंस्करण में निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी प्रोत्साहित करती है।
फंडिंग एवं सहयोग हस्तक्षेप
नर्सरी एवं अनुसंधान परियोजनाओं की स्थापना के लिए सरकार वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

हरित भारत मिशन
- हरित भारत मिशन (GIM) भारत की जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) के तहत आठ मिशनों में से एक है।
- इस मिशन का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से निपटते हुए भारत के वनावरण की रक्षा, पुनर्स्थापना एवं वृद्धि करना है।
- यह जैव-विविधता, जल संसाधनों एवं मैंग्रोव व आर्द्रभूमि जैसे पारिस्थितिक तंत्रों में सुधार पर ध्यान केंद्रित करता है।
- इस मिशन के तहत गतिविधियाँ वित्तीय वर्ष 2015-16 में शुरू की गईं।
मिशन लक्ष्य
- 5 मिलियन हेक्टेयर वन/वृक्षावरण का विस्तार और 5 मिलियन हेक्टेयर वन एवं गैर-वन भूमि की गुणवत्ता में सुधार करना।
- कार्बन भंडारण, जल प्रबंधन एवं जैव-विविधता जैसी पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को बढ़ावा देना।
- वन-आधारित गतिविधियों से आय बढ़ाकर 3 मिलियन परिवारों के लिए आजीविका में सुधार करना।
उप मिशन
- वनावरण को बढ़ाना : वन गुणवत्ता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं में सुधार करना।
- पारिस्थितिकी तंत्र बहाली : वनों का पुन:स्थापन और वन आवरण में वृद्धि करना।
- शहरी हरियाली : शहरों एवं आसपास के क्षेत्रों में अधिक वृक्ष लगाना।
- कृषि-वानिकी और सामाजिक वानिकी : बायोमास को बढ़ावा देना और कार्बन सिंक का निर्माण करना।
- आर्द्रभूमि बहाली : महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि को पुनर्जीवित करना।
परिस्थितिकी तंत्र सेवा सुधार परियोजना
यह मिशन छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश में विश्व बैंक समर्थित पहल ‘पारिस्थितिकी तंत्र सेवा सुधार परियोजना’ पर कार्यरत है।
फंडिंग एवं व्यय
- जुलाई 2024 तक 155,130 हेक्टेयर में वृक्षारोपण एवं पारिस्थितिकी बहाली के लिए 17 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश को 909.82 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं।
- महाराष्ट्र के पालघर जिले में दहानू डिवीजन में 464.20 हेक्टेयर को जी.आई.एम. के तहत वृक्षारोपण एवं पारिस्थितिकी बहाली के लिए कवर किया गया है।
वनाग्नि रोकथाम एवं प्रबंधन योजना
- यह एक केंद्र द्वारा प्रायोजित योजना है जो राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को वनाग्नि को रोकने एवं नियंत्रित करने में सहायता करती है।
- भारत में भारतीय वन सर्वेक्षण, देहरादून द्वारा प्रबंधित एक वनाग्नि पहचान प्रणाली है।
- यह लगभग वास्तविक समय में वनाग्नि का पता लगाने और जानकारी साझा करने के लिए रिमोट सेंसिंग तकनीक का उपयोग करती है।
- यह प्रणाली देश भर में वनाग्नि के शीघ्र पता लगाने और प्रभावी प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- वनाग्नि के परिणामस्वरूप उत्पन्न आपदाओं से निपटने के लिए एक आपदा प्रबंधन समूह का भी गठन किया गया है।

योजना के उद्देश्य
- वन अग्नि की घटनाओं को कम करना और प्रभावित क्षेत्रों में उत्पादकता को बहाल करना।
- वन सुरक्षा में स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर जोर देना।
- पर्यावरणीय स्थिरता बनाए रखने में योगदान।
- अग्नि खतरे की रेटिंग प्रणाली और पूर्वानुमान विधियों का विकास करना।
- अग्नि रोकथाम प्रयासों को बढ़ाने के लिए रिमोट सेंसिंग, जी.पी.एस. और जी.आई.एस. जैसी आधुनिक तकनीक के उपयोग को प्रोत्साहित करना।
- वन अग्नि के प्रभाव और व्यवहार के बारे में ज्ञान में सुधार करना।
कार्यान्वन
- सरकार ने वन अग्नि पर राष्ट्रीय कार्य योजना संसदीय समिति की सिफारिशों और एन.जी.टी. के निर्देशों के बाद विकसित की है।
- यह विश्व बैंक के साथ एक अध्ययन और राज्य वन विभागों और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण जैसे प्रमुख हितधारकों के साथ परामर्श पर आधारित है।
- वन अग्नि का पता लगाने के अलावा, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत भारतीय वन सर्वेक्षण ने एक उपग्रह-आधारित वन अग्नि निगरानी और चेतावनी प्रणाली विकसित की है।
- यह प्रणाली वन अग्नि का समय पर पता लगाने और निगरानी में मदद करती है।
- पंजीकृत उपयोगकर्ताओं को एस.एम.एस. और ईमेल के माध्यम से अग्नि अलर्ट भेजे जाते हैं जिससे त्वरित प्रतिक्रिया और बेहतर अग्नि प्रबंधन सुनिश्चित होता है।
प्रधानमंत्री वन धन योजना (PMVDY)
- यह योजना जनजातीय मामलों के मंत्रालय एवं ट्राइफेड द्वारा वर्ष 2018 में शुरू की गई थी।
- इस योजना का उद्देश्य वनोपज के मूल्य को बढ़ाकर आदिवासी समुदायों की आजीविका में सुधार करना है।
- यह योजना कौशल प्रशिक्षण, बुनियादी ढाँचा सहायता एवं बाजार संपर्क के माध्यम से आदिवासी संग्राहकों को उद्यमी बनने में मदद करती है।
वन धन विकास केंद्रो का गठन
- इस पहल के तहत आदिवासी समुदाय वन धन विकास केंद्र बनाते हैं जिनमें से प्रत्येक में 15 स्वयं सहायता समूहों के 300 सदस्य होते हैं।
- ये केंद्र लघु वनोपज के प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन एवं विपणन के लिए केंद्र के रूप में काम करते हैं।
वित्तीय सहायता एवं कार्यान्वन
- यह एक केंद्र प्रायोजित योजना है जिसमें प्रति केंद्र ₹15 लाख आवंटित किए गए हैं।
- आदिवासी सदस्य स्वामित्व सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक ₹1,000 का योगदान करते हैं।
- सरकार आदिवासी उत्पादों के लिए ब्रांडिंग, पैकेजिंग एवं वैश्विक बाजार पहुँच का भी समर्थन करती है।
दो चरणों में कार्यान्वन
- चरण I : बुनियादी सुविधाओं के साथ आदिवासी जिलों में 6,000 केंद्रों की स्थापना।
- चरण II : भंडारण एवं प्रसंस्करण इकाइयों जैसे बेहतर बुनियादी ढांचे के साथ सफल केंद्रों का विस्तार।
प्रभाव एवं लाभ
- पी.एम.वी.डी.वाई. स्थायी आजीविका उत्पन्न करता है।
- वन संरक्षण को बढ़ावा देता है।
- आदिवासी पलायन को हतोत्साहित करता है।
- आदिवासी अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय कृषि वानिकी नीति, हरित भारत मिशन, वन अग्नि रोकथाम एवं प्रबंधन योजना और वन धन योजना जैसी विभिन्न पहलों के माध्यम से वन संरक्षण तथा सतत विकास के लिए भारत की प्रतिबद्धता स्पष्ट है। ये कार्यक्रम न केवल वन पारितंत्र को बहाल करने और उनकी रक्षा करने में मदद करते हैं बल्कि आजीविका को बढ़ाते हैं तथा जलवायु अनुकूलन को बढ़ावा देते हैं और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करते हैं।