(प्रारंभिक परीक्षा : समसामयिक घटनाक्रम) (मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-1; भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के कला के रूप, साहित्य और वास्तुकला के मुख्य पहलू शामिल होंगे।) |
संदर्भ
बिहार के बोधगया में स्थित महाबोधि मंदिर के नियंत्रण को लेकर बौद्ध समुदाय द्वारा पूरे भारत में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं जिसमें महाबोधि मंदिर का नियंत्रण बौद्ध धर्म के लोगों को सौंपने की मांग की जा रही है।
महाबोधि मंदिर परिसर के बारे में
- परिचय : यह भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े चार पवित्र स्थलों में से एक है, यहाँ बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।
- अन्य तीन पवित्र स्थल सारनाथ (प्रथम उपदेश), कुशीनगर (महापरिनिर्वाण) और लुम्बिनी (जन्म स्थल) हैं।
- अवस्थिति : बोधगया, गया जिला (बिहार)
- निर्माण : महाबोधि मंदिर परिसर में पहला मंदिर सम्राट अशोक द्वारा तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में बनवाया था।
- शुंग काल (दूसरी से पहली शताब्दी ईसा पूर्व) के दौरान अतिरिक्त संरचनाओं का निर्माण किया गया था।
- वर्तमान मंदिर गुप्त काल का है जो कि (5वीं-6वीं शताब्दी) के अंत से पूरी तरह से ईंटों से निर्मित सबसे शुरुआती बौद्ध मंदिरों में से एक है।
- मंदिर परिसर में कई मूर्तियां आठवीं शताब्दी की हैं जो पाल वंश के दौरान बनाई गई थीं।
- यूनेस्को धरोहर : महाबोधि मंदिर परिसर को वर्ष 2002 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल किया गया था।
- संरक्षक : पाल शासक (8वीं-12वीं शताब्दी ई.) महाबोधि मंदिर के अंतिम प्रमुख शाही संरक्षक थे।
मंदिर की संरचनात्मक विशेषताएं
- मंदिर का निर्माण गुप्त काल की वास्तुकला की शास्त्रीय शैली में किया गया है।
- वर्तमान में महाबोधि मंदिर परिसर में 50 मीटर ऊंचा भव्य मंदिर, वज्रासन, पवित्र बोधि वृक्ष और बुद्ध के ज्ञानोदय के अन्य छह पवित्र स्थल शामिल हैं।
- मुख्य मंदिर की दीवार की औसत ऊंचाई 11 मीटर है।
- इसमें पूर्व और उत्तर से प्रवेश तथा आमलक और कलश के ऊपर एक घुमावदार शिखर है।
- मंदिर की चार दीवारों के चारों कोनों पर छोटे मंदिर कक्षों में बुद्ध की चार मूर्तियाँ हैं जो कि मूर्तिकला की उत्कृष्ट प्रारंभिक उदाहरण हैं।
- मंदिर का गर्भगृह 48 वर्ग फीट का बेलनाकार पिरामिड के रूप में है।
- गर्भगृह में बुद्ध की सोने की चित्रित प्रतिमा, पाल राजाओं द्वारा निर्मित है जहां बुद्ध को भूमिस्पर्श मुद्रा में दर्शाया गया है।
धार्मिक महत्व
- यह मंदिर पवित्र महाबोधि वृक्ष के पूर्व में स्थित है, जो भगवान बुद्ध (566-486 ईसा पूर्व) के जीवन से संबंधित है।
- इसी वृक्ष के नीचे ईसा पूर्व 531 में भगवान बुद्ध को बोध (ज्ञान) प्राप्त हुआ था।
- वर्तमान वृक्ष मूल बोधि वृक्ष का प्रत्यक्ष वंशज (संभवतः मूल वृक्ष का पाँचवाँ क्रम) है।
महाबोधि मंदिर नियंत्रण विवाद के बारे में
- मुद्दा क्या है : हालिया विरोध प्रदर्शन महाबोधि मंदिर के नियंत्रण को लेकर दशकों पुराने विवाद की ही निरंतरता है जिसमें बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949 को निरस्त करने की मांग की जाती रही है।
- वर्तमान में मंदिर का प्रबंधन किया इसी कानून द्वारा किया जाता है।
- कानूनी प्रावधान : बोधगया मंदिर कानून में महाबोधि मंदिर के संचालन के लिए एक 9 सदस्यीय समिति बनाने का प्रावधान है जिनकी नियुक्ति राज्य सरकार करती है।
- समिति के आठ सदस्यों में चार बौद्ध और चार हिंदू होते हैं तथा गया जिले का जिलाधिकारी इस समिति का पदेन अध्यक्ष होता है।
- विवाद का कारण : वर्तमान मंदिर संबंधित कानून में बौद्धों को मंदिर प्रबंधन में हिस्सेदारी के बावजूद प्रभावी नियंत्रण हिन्दू समुदाय के व्यक्तियों के पास ही रहा है। जोकि विवाद का मूल कारण है बौद्ध समुदाय के लोगों का कहना है कि इस प्रावधान के कारण बौद्ध धर्म के मंदिर में अनेक हिंदू अनुष्ठान कराए जाते हैं।
- बौद्ध धर्म का नियंत्रण : महाबोधि मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार 13वीं शताब्दी तक मंदिर का प्रबंधन बौद्ध धर्म के अनुयायियों द्वारा ही किया जाता था।
- हिंदू धर्म में मान्यता : महंत घमंडी गिरि नामक एक शैव साधु ने वर्ष 1590 के आसपास ‘गया शहर’ में एक हिंदू मठ (बोधगया मठ) की स्थापना की। जिसके बाद से मंदिर प्रबंधन में हिंदुओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
- शैव साधु महंत गिरी के वंशज आज भी महाबोधि मंदिर के प्रबंधन में शामिल हैं और इसे एक हिंदू धार्मिक स्थल बताते हैं।
- एक अन्य कारण हिन्दू धर्म के अनुयायियों द्वारा गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवां अवतार मानना है।
- बौद्ध समुदाय द्वारा आंदोलन : बोध गया के महाबोधि मंदिर को बौद्धों को सौंपने की मांग 19वीं शताब्दी में शुरू हुई।
- इस आंदोलन की शुरुआत श्रीलंकाई भिक्षु अनागारिक धम्मपाल द्वारा की गई थी
- आंदोलन के परिणामस्वरूप वर्ष 1949 में बिहार विधानसभा द्वारा ‘बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949’ पारित किया गया।