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बांग्लादेश में भारतीय पूँजी की रक्षा

मुख्य परीक्षा

(सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र -2; भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।)

संदर्भ 

भारत के पूर्वी पड़ोसी देश बांग्लादेश में उत्पन्न राजनीतिक शून्यता और अनिश्चितता से वहां काम करने वाली भारतीय कंपनियों की पूँजी की रक्षा भारत के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है। 

बांग्लादेश में भारतीय निवेश 

  • भारतीय कंपनियों ने बांग्लादेश में खाद्य तेल, बिजली, बुनियादी ढांचे, दैनिक उपभोग की वस्तुएं, ऑटोमोबाइल और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में निवेश किया है। 
  • राजनीतिक विरोध के बावजूद शेख हसीना सरकार ने भारतीय निवेशकों को आमंत्रित करने के लिए कई उपाय अपनाए जिसमें नामित विशेष आर्थिक क्षेत्र शुरू करना भी शामिल है।
    • भारतीय निवेशकों के लिए मोंगला और मीरसराय में दो समर्पित विशेष आर्थिक क्षेत्र विकसित किए जा रहे हैं।
  • मैत्री सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट बांग्लादेश इंडिया फ्रेंडशिप पावर कंपनी (BIFPCL) द्वारा विकसित किया है।
    • यह भारत की नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (NTPC) और बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड (BPDB) के बीच एक संयुक्त उद्यम है।
    • इसे भारतीय निर्यात-आयात (EXIM) बैंक से $1.6 बिलियन ऋण के माध्यम से वित्तपोषित किया गया है।
  • भारत-बांग्लादेश मैत्री पाइपलाइन पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी और बांग्लादेश के दिनाजपुर जिले के पर्बतीपुर रिफाइंड डीजल की आपूर्ति करती है। 
    • इस पाइपलाइन परियोजना के निर्माण में लगभग 346 करोड़ रुपये व्यय किए गए हैं। 
  • इससे अतिरिक्त भारत के टेक्सटाइल उद्यमियों के एक बड़ा वर्ग ने बांग्लादेश के सस्ते श्रम का लाभ उठाने के लिए वहां अपनी उत्पादन इकाइयाँ स्थापित की है। 
    • ये इकाइयाँ भारत से सूत का आयत करती हैं और और बाग्लादेश में तैयार कपड़े तथा वस्त्रों को भारत सहित अन्य देशों में निर्यात करती हैं। 
  • शेख हसीना के विरोधियों ने भारतीय वस्तुओं को निशाना बनाते हुए “इंडिया आउट”  जैसे बहिष्कार आंदोलन शुरू किए हैं। 
    • इस परिस्थिति में अंतरिम सरकार भारतीय कंपनियों के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया अपना सकती है।
    •  यह मौजूदा कानूनों को बदल सकती है या नए नियामक उपाय अपना सकती है जो भारतीय पूंजी पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।

भारतीय निवेशकों के लिए कानूनी सुरक्षा के विकल्प

  • विदेशी निवेश पर सामान्यत: तीन बुनियादी कानूनी ढाँचे लागू होते हैं : 
  • उस देश के घरेलू कानून जहाँ निवेश किया जाता है।
  • विदेशी निवेशक और मेज़बान राज्य की सरकार के बीच या मेज़बान राष्ट्र के विदेशी निवेशकों और कंपनियों के बीच अनुबंध पर हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। 
  • लागू संधियों, मान्यताओं और सामान्य कानूनी सिद्धांतों में निहित अंतर्राष्ट्रीय कानून जो अंतर्राष्ट्रीय कानून का दर्जा प्राप्त कर चुके हैं।
  • बांग्लादेश में निवेश करने वाली भारतीय कंपनियाँ अपने निवेश को विनियामक जोखिमों से बचाने के लिए पहले दो कानूनी ढाँचों का उपयोग कर सकती हैं। 
  • बांग्लादेश में भारतीय कंपनियाँ के निवेश को वहां के “विदेशी निजी निवेश (संवर्धन एवं संरक्षण) अधिनियम, 1980” के तहत विनियमित किया जाता है।
    • बाग्लादेश का यह कानून विदेशी निवेशकों को पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
    • हालाँकि, मेज़बान राष्ट्र के घरेलू कानून पर भरोसा करने की सीमाएँ हैं क्योंकि इसे किसी भी समय एक-पक्षीय रूप से बदला जा सकता है।
  • अंतिम कानूनी ढांचे के रूप में अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की भूमिका विशेषरूप से महत्वपूर्ण हो जाती है।

द्विपक्षीय निवेश संधि 

  • अंतर्राष्ट्रीय कानून को एकतरफा तरीके से नहीं बदला जा सकता है और इसका उपयोग राज्यों को उनके संप्रभु कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराने के लिए किया जा सकता है। 
  • विदेशी निवेश की सुरक्षा करते समय अंतर्राष्ट्रीय कानून में सबसे महत्वपूर्ण साधन द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) है। 
    • ऐसी संधियाँ मेजबान राष्ट्र के विनियामक व्यवहार पर शर्तें लगाकर निवेश की रक्षा कर विदेशी निवेशक के अधिकारों के साथ अनुचित हस्तक्षेप को रोकती हैं। 
    • इन शर्तों में मेजबान राज्यों को गैरकानूनी तरीके से निवेश जब्त करने से रोकना, मेजबान राज्यों पर विदेशी निवेश को उचित और न्यायसंगत उपचार (Fair and Equitable Treatment : FET) प्रदान करना और विदेशी निवेश के साथ भेदभाव न करने के दायित्व लागू करना शामिल है। 
  • द्विपक्षीय निवेश संधि के उल्लंघन की स्थिति में विदेशी निवेशकों सीधे अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण के समक्ष मेजबान राष्ट्र पर मुकदमा करने का अधिकार रखता है।
    • इसे निवेशक-राष्ट्र विवाद निपटान (Investor-State Dispute Settlement: ISDS) के रूप में जाना जाता है।
  • प्रतिकूल संप्रभु विनियमन के मामले में भारतीय कंपनियां वर्ष 2009 में हस्ताक्षरित भारत-बांग्लादेश द्विपक्षीय निवेश संधि पर भरोसा कर सकती हैं।
    • इसमें “उचित और न्यायसंगत उपचार”  प्रावधान सहित व्यापक मूल निवेश सुरक्षा सुविधाएँ शामिल हैं, जिनके आधार पर बांग्लादेशी संप्रभु नियामक आचरण को चुनौती दी जा सकती है।

भारतीय निवेशकों के लिए चुनौती 

  • भारत-बांग्लादेश ने वर्ष 2009 की संधि में विभिन्न शब्दों के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए वर्ष 2017 में संयुक्त व्याख्यात्मक नोट (Joint Interpretative Notes : JIN) अपनाया था।
  • यह इस बात पर विचार किए बिना किया गया कि भारत का किसी विशिष्ट देश के प्रति आक्रामक या रक्षात्मक हित है या नहीं।
    • इस जेआईएन ने द्विपक्षीय निवेश की सुरक्षा सुविधाओं को कमजोर कर दिया है। उदाहरण के लिए, कराधान उपायों को द्विपक्षीय निवेश संधि के दायरे से बाहर रखा गया है।
  • जेआईएन को आईएसडीएस दावों से अपने नियामक आचरण को सुरक्षित रखने के लिए पूंजी-आयात करने वाले देश के परिप्रेक्ष्य से डिजाइन किया गया है। 
    • भारत और बांग्लादेश के बीच नई दिल्ली पूंजी निर्यातक है, और ढाका आयातक है। ऐसे में भारत द्वारा विकसित JIN बांग्लादेश में संचालित भारतीय पूंजी के स्थान पर बांग्लादेश के लिए अधिक लाभकारी हो सकता है। 
  • इसी तरह FET प्रावधान परंपरागत अंतर्राष्ट्रीय कानून से जुड़ा हुआ है, जिसके तहत संधि के उल्लंघन को दर्शाने के लिए उच्च सीमा की आवश्यकता हो सकती है।

निष्कर्ष 

  • बांग्लादेश वर्तमान संदर्भ बिंदु प्रदान करता है, लेकिन यह मुद्दा भारत के पूर्वी पड़ोसी तक ही सीमित नहीं है। विगत कुछ वर्षों में भारत के बाह्य निवेश में कई गुना वृद्धि हुई है। 
  • भारत शीर्ष 20 पूंजी-निर्यातक देशों में से एक है। UNCTAD के अनुसार, वर्ष 2023 में भारत का बाह्य देशों में प्रत्यक्ष निवेश लगभग 13.5 बिलियन डॉलर था। 
  • इस प्रकार, विदेशों में भारतीय कंपनियों के लिए कानूनी संरक्षण का मुद्दा प्रमुखता प्राप्त करता है। ऐसे में भारत को अपने निवेश संधि अभ्यास को विकसित करना चाहिए, जिसमें मेजबान और घरेलू दोनों की स्थितियों को ध्यान में रखा जाए।
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