झारखण्ड और छोटा नागपुर आदिवासी क्षेत्रों में नव वर्ष और वसंत ऋतु के आगमन पर 1 अप्रैल को ‘सरहुल उत्सव’ का आयोजन किया गया।
सरहुल उत्सव के बारे में
- क्या है : सरहुल का शब्दिक अर्थ है - ‘साल वृक्ष की पूजा’। यह आदिवादी समुदाय के नये वर्ष का उत्सव है जो प्रकृति पूजा पर केन्द्रित है।
- यह उत्सव सूर्य और पृथ्वी के प्रतीकात्मक मिलन के उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है।
- आयोजन : यह पर्व प्रतिवर्ष चैत्र माह की अमावस्या के तीसरे दिन मनाया जाता है।
- आराध्य देवी : आदिवासी परंपरा में ऐसा माना जाता है कि साल के पेड़ों में ‘सरना देवी’ निवास करती हैं जो प्रतिकूल प्राकृतिक शक्तियों से गाँव की रक्षा करती हैं।
- क्षेत्र : यह उत्सव छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार एवं छोटा नागपुर क्षेत्र की ओरांव, मुंडा, संथाल, खड़िया एवं हो आदि जनजातियों द्वारा मनाया जाता है।
- साथ ही, यह उत्सव नेपाल, बांग्लादेश एवं भूटान आदि देशों में भी मनाया जाता है।
प्रमुख विशेषताएं
- इस दिन गाँव के सरना (पवित्र उपवन) में तीन दिवसीय पारम्परिक पूजा अर्चना का आयोजन किया जाता है।
- उत्सव के अंतिम दिन भव्य सामुदायिक भोज का आयोजन किया जाता है जिसमें हंडिया (चावल की बियर) का सेवन किया जाता है।
- इस दिन जदुर, गेन और पोर जैसे विशेष पारंपरिक नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है।
- यह उत्सव प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने एवं सामुदायिक एकता के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।