(प्रारंभिक परीक्षा : कला एवं संस्कृति) |
चर्चा में क्यों
थाईलैंड की यात्रा के दौरान, प्रधानमंत्री मोदी ने थाईलैंड के राजा महा वजिरालोंगकोर्न को सारनाथ शैली में निर्मित बुद्ध की पीतल की प्रतिमा उपहार में दी।

सारनाथ मूर्तिकला शैली के बारे में
- उद्भव एवं विकास : इस शैली का उद्भव कुषाण काल में हुआ और गुप्त काल के दौरान यह अपनी विकसित अवस्था में पहुंची।
- नामकरण : इस शैली के सारनाथ में उत्पत्ति के कारण इसका नाम सारनाथ शैली पड़ा।
- सारनाथ में ही महात्मा बुद्ध ने ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ (प्रथम उपदेश) दिया था।
- सारनाथ से कुषाणकाल की एक बोधिसत्व की खड़ी मुद्रा में विशाल मूर्ति मिली।
- निर्माण सामग्री : प्राचीन काल में बलुआ पत्थर का प्रयोग किया जाता था, वर्तमान में पत्थर के साथ-साथ पीतल जैसी धातुओं का भी प्रयोग किया जाता है।
- विशेषताएं : सारनाथ कला की बुद्ध की मूर्तियां, शांति और ज्ञान की भावना प्रकट करती हैं।
- शारीरिक संरचना : बुद्ध की मूर्तियों में झुकी हुई आंखें और तीखी नाक होती है, होठों पर सौम्य मुस्कान उकेरी गई है। सारनाथ स्कूल के बुद्ध का चेहरा कोमल है जिसमें बहुत शांति और ज्ञान है।
- मुद्रा : बुद्ध को धर्मचक्र मुद्रा (शिक्षा मुद्रा) में बैठे हुए दिखाया जाता है, उनके हाथ शिक्षा देने और धर्म चक्र घुमाने की मुद्रा में होते हैं।
- शारीरिक मुद्रा : मूर्तियों में अक्सर अभंग मुद्रा दर्शाई जाती है, जिसमें शरीर थोड़ा झुका होता है, जिससे गति और सुंदरता का आभास होता है।
- प्रभामंडल : बुद्ध की मूर्ति के पीछे का प्रभामंडल अक्सर जटिल पुष्प डिजाइनों से सुसज्जित होता है, जो मूर्ति की सुंदरता और आध्यात्मिक महत्व को बढ़ाता है।